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    CRISPR Blood Test For Cancer: क्या ब्लड टेस्ट से पता लग सकता है कैंसर, ट्यूमर बनने से पहले कैसे पता लगेगी दिक्कत?

    1 week ago

    Can A Blood Test Detect Cancer Early: दुनियाभर में कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, इसके पीछे जो सबसे बड़ा रीजन है वह है कि इसके लक्षण जल्दी दिखाई नहीं देते हैं. तमाम तरह के जांच कराने के बाद इसका पता चलता है. हालांकि, अब एक साधारण ब्लड टेस्ट भविष्य में कैंसर का पता उस समय लगा सकता है. दरअसल साइंटिस्ट ने एक बेहद सेंसिटिव लाइट-आधारित सेंसर डिवेलप्ड किया है, जो खून में मौजूद कैंसर बायोमार्कर की अत्यंत सूक्ष्म मात्रा सब-एटोमोलर लेवल तक पहचान सकता है. यानी जांच के लिए सिर्फ कुछ मॉलिक्यूल की मौजूदगी ही काफी हो सकती है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर क्या खोज हुई है और यह तकनीक कैसे काम करती है. 

    कैसे काम करता है यह?

    Optica जर्नल में पब्लिश स्टडी के अनुसार, शेनजेन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर हान झांग की अगुवाई में शोधकर्ताओं ने डीएनए नैनोस्ट्रक्चर, क्वांटम डॉट्स, क्रिसपर जीन-एडिटिंग तकनीक और सेकंड हार्मोनिक जनरेशन नामक एक ऑप्टिकल तकनीक को मिलाकर यह सिस्टम तैयार किया. यह तकनीक मरीज के खून में कैंसर से जुड़े माइक्रोआरएनए को पारंपरिक RT-qPCR से अधिक सेंसिटिविटी के साथ पहचानने में सक्षम रही.

    अभी किस तरह होती हैं जांच?

    अभी ज्यादातर शुरुआती जांच या तो इमेजिंग पर आधारित होती है, जिसमें ट्यूमर तब दिखता है जब वह एक निश्चित आकार ले चुका हो, या फिर पीसीआर जैसी तकनीकों पर, जो जेनेटिक सामग्री को कई गुना बढ़ाकर मापती हैं. नई तकनीक इन दोनों से अलग है. इसमें किसी केमिकल एम्प्लीफिकेशन की जरूरत नहीं पड़ती. जैसे ही कैंसर बायोमार्कर मौजूद होता है, लाइट सिग्नल में सीधा बदलाव आता है और वही जांच का आधार बनता है.

    मॉलिक्यूल जीन को कंट्रोल करते हैं छोटे आरएनए

    यह सेंसर खास तौर पर माइक्रोआरएनए पर ध्यान देता है.ये छोटे आरएनए मॉलिक्यूल जीन को नियंत्रित करते हैं. miR-21, miR-155 और miR-10b जैसे माइक्रोआरएनए लंग्स के कैंसर के शुरुआती चरण से जुड़े पाए गए हैं. शुरुआती अवस्था में इनकी मात्रा बेहद कम होती है, इसलिए इन्हें पकड़ने के लिए असाधारण संवेदनशीलता चाहिए. लैब में यह डिवाइस miR-21 को 168 जेप्टोमोलर तक की बेहद कम कंसंट्रेटेड पर भी पहचान सका, जो सामान्य सैंपल में महज कुछ दर्जन अणुओं के मॉलिक्यूल होती है. इसमें मोलिब्डेनम डिसल्फाइड की एक पतली परत का इस्तेमाल किया गया, जो SHG सिग्नल के लिए जानी जाती है.

    एक्सपर्ट का मानना है कि यदि माइक्रोआरएनए को ट्यूमर बनने से पहले ही पकड़ा जा सके तो कैंसर स्क्रीनिंग का तरीका बदल सकता है. भविष्य में यह अन्य कैंसर, वायरल संक्रमण, बैक्टीरियल रोग और यहां तक कि अल्जाइमर जैसे न्यूरोडीजेनेरेटिव रोगों की पहचान में भी उपयोगी हो सकता है.

    यह भी पढ़ें: क्या खाली पेट काम करता है दिमाग ज्यादा बेहतर? जानिए फास्टिंग का मेंटल हेल्थ पर असर और फायदे

    Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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