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    क्या दवाओं से ज्यादा असरदार होंगे न्यूट्रास्युटिकल्स? प्रिवेंटिव हेल्थकेयर का नया ट्रेंड समझें

    5 days ago

    आजकल की लाइफस्टाइल में सेहत के प्रति भी लोगों का नजरिया बदल रहा है. अब लोग बीमार होने के बाद अस्पताल जाने की जगह बीमार न पड़ने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं. इसी सोच ने भारत में न्यूट्रास्युटिकल्स (Nutraceuticals) के बाजार को जन्म दिया है, जो काफी तेजी से बढ़ रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या न्यूट्रास्युटिकल्स दवाओं से ज्यादा कारगर साबित होंगे? आइए आपको प्रिवेंटिव हेल्थकेयर के नए ट्रेंड से रूबरू कराते हैं. 

    क्या होते हैं न्यूट्रास्युटिकल प्रॉडक्ट्स?

    न्यूट्रास्युटिकल ऐसे प्रॉडक्ट्स होते हैं, जो डाइट के साथ-साथ औषधीय लाभ भी देते हैं, जैसे विटामिन सप्लीमेंट्स, प्रोबायोटिक्स और हर्बल प्रॉडक्ट्स आदि. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का न्यूट्रास्युटिकल उद्योग विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को पूरा करने में अहम भूमिका निभाएगा. मुंबई के जियो वर्ल्ड कन्वेंशन सेंटर में आयोजित वीटाफूड्स इंडिया 2026 के चौथे एडिशन में एफएसएसएआई (FSSAI) की रीजनल डायरेक्टर प्रीति चौधरी ने बताया कि भविष्य में इस क्षेत्र की क्षमता फार्मास्यूटिकल्स (दवा उद्योग) से कम से कम दस गुना ज्याद हो सकती है. इसका कारण यह है कि दवाएं आमतौर पर बीमारी के बाद ली जाती हैं, जबकि न्यूट्रास्युटिकल का इस्तेमाल रोजाना सेहत को बनाए रखने और बीमारियों को रोकने के लिए किया जाता है.

    बदलती आबादी और बढ़ती मांग

    इंफॉर्मा मार्केट्स इन इंडिया के एमडी योगेश मुद्रास के मुताबिक, भारत में इस ट्रेंड के पीछे दो बड़े कारण हैं. इनमें पहला बुजुर्गों की बढ़ती संख्या और दूसरा युवाओं का बदलता लाइफस्टाइल है. अनुमान है कि 2050 तक भारत में बुजुर्गों की आबादी 347 मिलियन तक पहुंच जाएगी, जिन्हें एनर्जी और बेहतर पाचन के लिए खास पोषण की जरूरत होगी. वहीं, 25 से 45 वर्ष के युवा अब सप्लीमेंट्स को अपने डेली रूटीन का हिस्सा बना रहे हैं. मध्यम वर्ग के लगभग 35% लोग अब अपनी डेली वेलनेस (रोजमर्रा की सेहत) पर खर्च करने को तैयार हैं.

    आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान का मेल

    हेल्थ फूड्स एंड डायटरी सप्लीमेंट्स असोसिएशन के महासचिव कौशिक देसाई का कहना है कि भारत के लिए सबसे बड़ी ताकत उसकी जैव विविधता और आयुर्वेद की विरासत है. विशेषज्ञों का कहना है कि आयुर्वेदिक उत्पादों का बाजार 18.4% की तेज गति से बढ़ रहा है और 2030 तक यह 22.37 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच सकता है. आजकल के उपभोक्ता अब केवल दवा नहीं चाहते, बल्कि वे क्लीन-लेबल (बिना मिलावट वाले शुद्ध प्रॉडक्ट्स) और पौधों पर आधारित (plant-based) ऑप्शंस तलाश रहे हैं. अब पोषण केवल कड़वी गोलियों तक सीमित नहीं है. बाजार में अब स्वादिष्ट गमीज (Gummies), खास पेय पदार्थ और व्यक्तिगत पोषण (personalized nutrition) जैसे नए ऑप्शंस युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हो रहे हैं.

    सरकार का सहयोग और भविष्य की राह

    भारत सरकार भी इस क्षेत्र की गंभीरता को समझते हुए बड़ा निवेश कर रही है. बायोफार्मास्युटिकल उद्योग के लिए 10,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जिन्हें अगले पांच वर्षों (2026-2031) में खर्च किया जाएगा. इससे कंपनियों को नए शोध और उत्पादन क्षमता बढ़ाने में मदद मिलेगी. भारत अब न केवल घरेलू मांग पूरी कर रहा है, बल्कि यूके, यूएसए और यूएई जैसे बड़े देशों के साथ व्यापार समझौतों के जरिए वैश्विक स्तर पर भी अपनी धाक जमा रहा है.

    ये भी पढ़ें: अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड लोगों को बना रहा शुगर का मरीज, नेपाल में शुरू हुई रिसर्च बनेगी गेम-चेंजर

    Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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