Search

    Language Settings
    Select Website Language

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policy, and Terms of Service.

    dailyadda
    dailyadda

    ईरान संकट से कैसे हिली भारत की गैस सप्लाई और कौन-कौन से सेक्टर प्रभावित? जानें एक-एक डिटेल

    5 days ago

    पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब भारत की ऊर्जा व्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है. ईरान संकट के बाद स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई और कतर में LNG उत्पादन रुकने से भारत की प्राकृतिक गैस सप्लाई चेन को बड़ा झटका लगा है. इस स्थिति से देश की कई बड़ी गैस कंपनियां प्रभावित हुई हैं, जिनमें Petronet LNG, गेल (GAIL), इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड (IGL), महानगर गैस लिमिटेड (MGL), गुजरात स्टेट पेट्रोनट लिमिटेड (GSPL) और एजिस लॉजिस्टिक शामिल हैं.

    यह संकट सिर्फ कंपनियों तक सीमित नहीं है बल्कि इसका असर खाद उत्पादन, उद्योग, बिजली और आम लोगों की रसोई तक पड़ सकता है. पहले  समझिए कि भारत की गैस सप्लाई चेन कैसे काम करती है. भारत में प्राकृतिक गैस की सप्लाई एक लंबी अंतरराष्ट्रीय श्रृंखला के जरिए चलती है. आमतौर पर LNG (Liquefied Natural Gas) कतर के रास लफान से जहाज़ों में भरकर निकलती है और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz) पार करके भारत पहुंचती है.

    भारत में इसे मुख्य रूप से गुजरात के दहेज और केरल के कोच्चि स्थित LNG टर्मिनलों पर उतारा जाता है, जिन्हें पेट्रोनेट LNG संचालित करती है. दहेज टर्मिनल की क्षमता करीब 17.5 मिलियन टन प्रति वर्ष है, जबकि Kochi टर्मिनल की क्षमता लगभग 5 मिलियन टन प्रति वर्ष है. LNG को -162 डिग्री सेल्सियस पर तरल रूप में रखा जाता है और भारत पहुंचने के बाद टर्मिनलों पर इसे दोबारा गैस में बदला जाता है. इस प्रक्रिया को पुनर्गैसीकरण (Regasification)कहा जाता है. इसके बाद यह RLNG के रूप में पाइपलाइन नेटवर्क में भेजी जाती है.

    GAIL की पाइपलाइन

    भारत में गैस को पूरे देश तक पहुंचाने का काम मुख्य रूप से GAIL करती है. कंपनी के पास करीब 18,000 किलोमीटर लंबा पाइपलाइन नेटवर्क है और गैस ट्रांसमिशन बाजार में उसकी हिस्सेदारी लगभग 65 प्रतिशत है. सबसे महत्वपूर्ण हजीरा-विजयपुर-जगदीशपुर है, जिसकी लंबाई करीब 2887 किलोमीटर है और यह 1989 में चालू हुई थी. यह पाइपलाइन गुजरात के हजीरा से शुरू होकर मध्य प्रदेश के विजईपुर होते हुए उत्तर प्रदेश के जगदीशपुर तक जाती है और उत्तर भारत के बड़े हिस्से दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब को गैस उपलब्ध कराती है.

    दहेज LNG टर्मिनल से आने वाली गैस दहेज-बीजापुर पाइपलाइन के जरिए HVJ नेटवर्क में पहुंचती है. जिसकी लंबाई लगभग 610 किलोमीटर और क्षमता करीब 23.9 mmscmd है यानि  कि इस पाइपलाइन की क्षमता रोज लगभग 24 मिलियन क्यूबिक मीटर गैस ले जाने की हुई.) इसके अलावा पूर्वी भारत को गैस से जोड़ने के लिए Jagdishpur-Haldia-Bokaro-Dhamra Pipeline यानी उर्जा गंगा परियोजना बनाई गई है, जिसकी लंबाई लगभग 3,306 किलोमीटर है और यह उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल तक गैस पहुंचाती है.

    GAIL की गैस कहां से आती थी और अब क्या स्थिति है

    भारत की सबसे बड़ी गैस ट्रांसमिशन और ट्रेडिंग कंपनी GAIL अपनी LNG सप्लाई मुख्य रूप से क़तर और अमेरिका से लाती रही है. कतर से गैस पेट्रोनेट LNG के जरिए आती थी, जिसका कतर एनर्जी के साथ करीब 8.5 मिलियन टन प्रति वर्ष का लंबी अवधि का अनुबंध है. यह LNG जहाज़ों के जरिए क़तर के रास लफान से गुजरात के दहेज टर्मिनल तक पहुंचती थी और फिर GAIL की पाइपलाइन नेटवर्क के जरिए पूरे देश में सप्लाई होती थी. इसके अलावा GAIL के अमेरिका के सबाइन पास और को पाइंट से भी LNG अनुबंध हैं, जिनसे जहाज़ स्वेज कैनॉल के रास्ते भारत आते हैं.

    मौजूदा संकट में स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में सुरक्षा जोखिम बढ़ने से क़तर से आने वाली LNG सप्लाई लगभग रुक गई है जिसके कारण गेल को मिलने वाला Qatari LNG allocation शून्य हो गया है. फिलहाल कंपनी की राहत केवल अमेरिका से आने वाली सप्लाई है जो हॉर्मुज मार्ग से नहीं गुजरती और स्वेज कैनॉल के रास्ते भारत पहुंच रही है.

    28 फरवरी 2026 को जब स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बंद हुआ. गेल की गैस सप्लाई का सबसे बड़ा हिस्सा एक झटके में रुक गया. पेट्रोनेट LNG ने बीएसई फिलिंग में साफ कहा कि "मौजूदा सुरक्षा स्थिति और मैरिटाइम नेविगेशन को मैटेरियल रिस्क की वजह से तीनों कतर टैंकर, दिशा, राही और असीम, स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से सुरक्षित नहीं गुजर पा रहे. ये तीनों जहाज कतर के रास लफान टर्मिनल से दहेज तक हर ट्रिप में करीब 65,000 से 75,000 टन LNG लाते थे और अब ये तीनों स्ट्रेट के बाहर खड़े हैं. 

    इससे भारत के सालाना LNG आयात का 40-45 प्रतिशत यानी 10 से 11 MTPA सप्लाई एक झटके में बंद हो गई. दूसरी तरफ GAIL के अपने चार जहाज GAIL भुवन, GAIL ऊर्जा, Grace Emilia और CoolCo वाला चौथा करियर यूएस के सबाइन पास और कोव पाइंट से स्वेज कैनालहोते हुए आते हैं. इसलिए ये अभी चल रहे हैं. यानी तुरंत कोई राहत मिलना मुमकिन नहीं. कतर के तीन जहाज जो घंटों में डिलीवर करते थे, उनकी जगह भरना इतना आसान नहीं. ईरान युद्ध ने GAIL की सप्लाई चेन की वो कमजोर कड़ी तोड़ दी जो सबसे ज्यादा भार उठाती थी.

    भारत की निर्भरता कितनी है?

    भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर काफी हद तक निर्भर है. अनुमान के अनुसार भारत की LNG सप्लाई का लगभग 50 से 60 प्रतिशत हिस्सा उसी समुद्री रास्ते से आता है जो स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से गुजरता है. फरवरी 2026 में भारत ने करीब 1.86 मिलियन टन LNG आयात की थी. जिसमें से लगभग 41.2 प्रतिशत अकेले कतर से आई थी. पेट्रोनेट LNG का कतर एनर्जी के साथ 8.5 मिलियन टन प्रति वर्ष का दीर्घकालिक अनुबंध है, जो भारत की गैस सप्लाई का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है.

    क़तर के गैस फील्ड से निकलने वाली LNG जब जहाज़ों में भरकर भारत आती है तब ही यह पूरी सप्लाई चेन चलती है. जहाज से टर्मिनल, टर्मिनल से पाइपलाइन और पाइपलाइन से शहरों तक. जब इस चेन की शुरुआत यानी जहाज़ों की आवाजाही प्रभावित होती है तो उसका असर धीरे-धीरे पूरी ऊर्जा व्यवस्था पर पड़ता है. यही कारण है कि पश्चिम एशिया में पैदा हुआ संकट भारत में गैस सप्लाई, उद्योग, CNG और घरेलू PNG तक असर डाल सकता है.

    अब यहां गैस का इस्तेमाल कहां-कहां होता है वो देखिए तो असर समझा आएगा?

    भारत में प्राकृतिक गैस का उपयोग कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में होता है. PNGRB के आंकड़ों के अनुसार देश में 2023-24 के दौरान औसतन लगभग 187 MMSCMD गैस की खपत हुई. इसमें सबसे बड़ा हिस्सा खाद उद्योग का है जहां करीब 58 MMSCMD गैस इस्तेमाल होती है. 

    यूरिया बनाने में प्राकृतिक गैस सबसे अहम कच्चा माल है और इसकी कुल उत्पादन लागत का लगभग 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा गैस का होता है. इसके बाद सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर आता है, जहां करीब 37 MMSCMD गैस CNG वाहनों और घरेलू PNG के रूप में इस्तेमाल होती है. बिजली उत्पादन के लिए लगभग 25.2 MMSCMD गैस उपयोग में लाई जाती है जबकि रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल उद्योगों में करीब 22 MMSCMD गैस का इस्तेमाल होता है. इसके अलावा सिरेमिक, ग्लास, स्टील, टायर और केमिकल उद्योग भी बड़े पैमाने पर प्राकृतिक गैस पर निर्भर हैं.

    आम लोगों तक गैस कैसे पहुंचती है?

    पाइपलाइन नेटवर्क से गैस सीधे आम लोगों तक नहीं जाती बल्कि इसे सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों के जरिए अंतिम उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जाता है. दिल्ली-NCR में यह काम  इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड (IGL) करती है, जिसके लगभग 976 CNG स्टेशन हैं और करीब 33 लाख से अधिक घरों में PNG कनेक्शन हैं. मुंबई, ठाणे और रायगढ़ क्षेत्रों में गैस सप्लाई महानगर गैस लिमिटेड (MGL) करती है, जिसके राजस्व का लगभग 70 से 75 प्रतिशत हिस्सा CNG से आता है. गुजरात में गैस ट्रांसमिशन का बड़ा हिस्सा GSPL के नेटवर्क के जरिए होता है, जबकि एजिस लॉजिस्टिक LNG और LPG के टर्मिनल संचालन और बल्क हैंडलिंग का काम करती है.

    खेती और उद्योग पर असर

    गैस सप्लाई में रुकावट का असर सीधे खाद उद्योग पर पड़ सकता है. रिपोर्टों के अनुसार गैस की उपलब्धता में 10 प्रतिशत से अधिक की कमी के कारण कुछ यूरिया संयंत्रों ने उत्पादन करीब 7 से 8 प्रतिशत तक घटा दिया है. हालांकि, फरवरी 2026 के अंत तक देश में लगभग 55 लाख टन यूरिया का स्टॉक मौजूद है, जो पिछले वर्ष की तुलना में अधिक है. इसलिए फिलहाल तत्काल संकट की स्थिति नहीं है, लेकिन यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो भारत को महंगे अंतरराष्ट्रीय बाजार से यूरिया आयात करना पड़ सकता है.

    आगे क्या हो सकता है

    ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक बना रहा तो भारत को गैस सप्लाई की प्राथमिकता तय करनी पड़ सकती है. ऐसी स्थिति में सबसे पहले घरेलू PNG और CNG की सप्लाई को प्राथमिकता दी जाएगी जबकि उद्योगों की गैस आपूर्ति घटाई जा सकती है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में LNG की कीमतें पहले ही तेजी से बढ़कर लगभग 23 डॉलर प्रति MMBtu तक पहुंच चुकी हैं.

    इस पूरी स्थिति से साफ है कि क़तर के गैस फील्ड से निकलकर भारत के LNG टर्मिनल पाइपलाइन नेटवर्क और CNG स्टेशन तक पहुंचने वाली पूरी सप्लाई चेन आपस में जुड़ी हुई है. अगर इस चेन में कहीं भी रुकावट आती है तो उसका असर सीधे आम लोगों की रसोई, गाड़ियों के ईंधन और किसानों की खाद तक पहुंच सकता है.

    भारत में कहां-कहां असर पड़ रहा?

    फर्टिलाइजर सेक्टर

    भारत में प्राकृतिक गैस का सबसे बड़ा इस्तेमाल उर्वरक उद्योग में होता है. देश में रोज़ होने वाली कुल गैस खपत का लगभग 58 mmscmd हिस्सा यूरिया बनाने में जाता है. यूरिया की उत्पादन लागत का करीब 70–80 प्रतिशत हिस्सा गैस होता है. गैस सप्लाई कम होने से कुछ यूरिया प्लांट्स ने उत्पादन 7–8% तक घटाना शुरू कर दिया है. इसका सीधा असर खेती और खाद की उपलब्धता पर पड़ सकता है.

    CNG और घरेलू PNG (City Gas Distribution)

    दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद जैसे शहरों में लाखों वाहन CNG पर चलते हैं और करोड़ों लोग घरों में PNG से खाना बनाते हैं. इस सेक्टर में करीब 37 mmscmd गैस की खपत होती है. गैस सप्लाई कम होने या महंगी होने का असर सीधे CNG की कीमत और घरेलू PNG बिल पर पड़ सकता है.

    बिजली उत्पादन (Power Sector)

    गैस आधारित बिजली संयंत्र रोज़ करीब 25.2 mmscmd गैस का उपयोग करते हैं. हालांकि भारत में गैस से बनने वाली बिजली का हिस्सा करीब 2% है, लेकिन पीक डिमांड के समय ये प्लांट अहम भूमिका निभाते हैं. गैस कम होने पर इन संयंत्रों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है.

    रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल उद्योग


    तेल रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल कंपनियां गैस का इस्तेमाल ईंधन और कच्चे माल दोनों रूप में करती हैं. इससे पेट्रोल, डीजल, प्लास्टिक और सिंथेटिक फाइबर जैसे उत्पाद बनते हैं. गैस महंगी होने का असर इन उत्पादों की लागत पर भी पड़ सकता है.

    होटल, रेस्तरां और कमर्शियल सेक्टर

    होटल, रेस्टोरेंट, बेकरी, कैटरिंग यूनिट और अस्पतालों में बड़ी मात्रा में PNG गैस इस्तेमाल होती है. गैस सप्लाई में कमी या कीमत बढ़ने से इनकी संचालन लागत बढ़ सकती है, जिसका असर खाने-पीने की कीमतों तक पहुंच सकता है.

    सिरेमिक और ग्लास उद्योग

    गुजरात और राजस्थान में सिरेमिक टाइल्स, सैनिटरीवेयर और ग्लास बनाने वाले उद्योग प्राकृतिक गैस पर काफी निर्भर हैं. गैस सप्लाई बाधित होने से इन क्षेत्रों में उत्पादन में कमी या लागत बढ़ने की आशंका है.

    स्टील, टायर, पेंट और केमिकल उद्योग

    ये सेक्टर गैस के सीधे या अप्रत्यक्ष बड़े उपभोक्ता हैं. गैस महंगी होने से इनकी इनपुट लागत बढ़ती है, जो अंत में उपभोक्ता तक महंगे सामान के रूप में पहुंचती है.

    Click here to Read More
    Previous Article
    US आर्मी और फाइटर जेट्स के खुफिया इनपुट ईरान को दे रहा रूस, जंग के बीच अमेरिका का बड़ा दावा
    Next Article
    T20 World Cup Prize Money: टी20 वर्ल्ड कप 2026 की प्राइज मनी का खुलासा, विजेता से लेकर सुपर-8 तक पहुंचने वाली टीमों को मिलेंगे कितने पैसे? जानिए

    Related विश्व Updates:

    Are you sure? You want to delete this comment..! Remove Cancel

    Comments (0)

      Leave a comment