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    पड़ोसी बांग्लादेश में BNP की जीत का बंगाल-असम चुनाव पर क्या असर होगा?

    1 day ago

    कभी भारत की धुर विरोधी रहीं बांग्लादेश की प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के मुखिया तारिक रहमान का बांग्लादेश का नया प्रधानमंत्री बनना तय है. उनकी बंपर जीत की एक बड़ी वजह तो ये भी है कि भारत की दोस्त शेख हसीना और उनकी पार्टी अवामी लीग को ये चुनाव लड़ने का मौका ही नहीं मिला और भारत के वो तमाम हिमायती मजबूरी में ही सही, लेकिन तारिक रहमान के साथ चले गए. यहां सवाल ये है कि तारिक रहमान की जीत से भारत को क्या नफा या फिर क्या नुकसान है.

    उससे भी बड़ा सवाल कि भारत के जिन दो राज्यों पश्चिम बंगाल और असम की सीमाएं बांग्लादेश से लगती हैं, वहां कुछ ही महीनों में होने वाले विधानसभा चुनाव पर बीएनपी की जीत का क्या असर होगा. उससे भी बड़ा सवाल कि बांग्लादेश के चुनाव में जिस जमात-ए-इस्लामी की हार हुई है, वो अपनी हार के बाद भारत के पड़ोसी राज्यों में कौन सा गुल खिलाने की तैयारी में है. इन सभी सवालों का क्लियर कट जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे आज.

    बांग्लादेश भारत का वो पड़ोसी मुल्क है जिसकी करीब 4 हजार किलोमीटर लंबी सीमा रेखा भारत के साथ लगती है. ऐसे में बांग्लादेश की शांति और स्थिरता में ही भारत का भी हित निहित है. लिहाजा भारत की भी कोशिश बांग्लादेश की सरकार के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की है. तभी तो तारिक रहमान की जीत के साथ ही शुरुआती बधाई देने वाले नेताओं में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी थे, जिन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करके तारिक रहमान को बधाई दी और लिखा-

    'यह जीत दिखाती है कि बांग्लादेश की जनता को आपके नेतृत्व पर भरोसा है. भारत एक लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और समावेशी बांग्लादेश के समर्थन में खड़ा रहेगा. मैं बहुआयामी संबंधों को मजबूत करने और साझा विकास लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए आपके साथ काम करने के लिए उत्सुक हूं.'

    इतना ही नहीं तारिक रहमान के शपथ ग्रहण समारोह में भी भारत ने अपना प्रतिनिधिमंडल भेजा है, जिसके मुखिया लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिरला हैं. इससे जाहिर है कि भारत उम्मीदों के साथ तारिक रहमान के नेतृत्व की तरफ देख रहा है, लेकिन क्या तारिक रहमान भी भारत की तरफ उतनी ही गर्मजोशी के साथ देख पा रहे हैं, इसका जवाब तब मिलेगा, जब शेख हसीना के तख्तापलट के बाद बांग्लादेश में शुरु हुआ हिंदुओं का उत्पीड़न रुकेगा, जिसके लिए तारिक रहमान वायदा कर चुके हैं. अब उन्हें अपने वादे पर अमल करना है और भारत को भी उसका ही इंतजार है.

    अभी का सबसे जरूरी सवाल पश्चिम बंगाल और असम से जुड़ा हुआ है, जहां मुस्लिम आबादी करीब-करीब 30 फीसदी की है. बीजेपी असम को फिर से जीतना चाहती है और बंगाल उसकी विश लिस्ट में है. दोनों ही जगहों पर बांग्लादेश में हो रहा हिंदुओं का उत्पीड़न और बांग्लादेश से हो रही घुसपैठ भारत के इन दोनों ही राज्यों का चुनावी मुद्दा भी रही है. बंगाल में इसे चुनावी मुद्दा बनाया है भारतीय जनता पार्टी के नेता शुवेंदु अधिकारी ने, जिन्होंने हिंदुओं पर हमले को लेकर हमेशा से बयान दिया है कि वो बंगाल को बांग्लादेश नहीं बनने देंगे. अपने मुद्दे को और प्रभावी बनाने के लिए, ध्रुवीकरण को और मजबूती देने के लिए शुवेंदु अधिकारी ने बंगाल में मोहम्मद यूनूस के पुतले जलाए थे, कोलकाता में बांग्लादेश हाई कमीशन तक मार्च निकाला था और सैकड़ों साधु-संतों को लेकर हाई कमीशन का घेराव तक कर दिया था.

    उनका ये बयान तब तक प्रासंगिक था, जब तक बांग्लादेश की कमान मोहम्मद यूनूस के हाथ में थी और जिनके नेतृत्व में जमात-ए-इस्लामी न सिर्फ बांग्लादेशी हिंदुओं पर जुल्म करती थी बल्कि उसकी वजह से शुवेंदु अधिकारी बंगाल में ध्रुवीकरण की भी कोशिश कर पाते थे. लेकिन अब जब बांग्लादेश पर से जमात-ए-इस्लामी का नियंत्रण पूरी तरह से खत्म हो चुका है और तारिक रहमान भारत को हिंदुओं की सुरक्षा की गारंटी दे चुके हैं तो फिर स्वाभाविक है कि धार्मिक ध्रुवीकरण का मुद्दा कमजोर होगा. ऐसे में शुवेंदु अधिकारी के सामने एक नया मुद्दा तलाश करने की भी चुनौती है, जिसके जरिए वो ध्रुवीकरण कर सकें.

    असम में भी कमोबेश ऐसी ही स्थिति है. असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा न सिर्फ बांग्लादेश में हुए हिंदुओं पर हमले से चिंतित थे, बल्कि उनकी चिंता बांग्लादेशी घुसपैठिए भी थे. और ये सब तब था, जब लगता था बांग्लादेश का नियंत्रण मोहम्मद यूनूस के बाद जमात-ए-इस्लामी के हाथ में आ जाएगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. जमात 70 से भी कम 68 सीटों पर सिमटकर बांग्लादेश की राजनीति पर बेअसर रही. और जब जमात का असर बांग्लादेश की अवाम पर नहीं हुआ, तो भारत में और खास तौर पर बंगाल-असम में भी वो बेअसर ही रहेगी. लिहाजा उम्मीद इसी बात की है कि पड़ोसी होने के नाते जिस बांग्लादेश की राजनीति का प्रभाव असम और बंगाल के चुनाव पर हमेशा पड़ता था, वो इस बार नहीं पड़ेगा. बंगाल के लोग बंगाल के मुद्दों पर वोट करेंगे और असम के लोग असम के मुद्दों पर, क्योंकि बांग्लादेश के लोगों ने अपने मुद्दों पर वोट देकर जमात को सरकार बनाने से रोक दिया है.

    लेकिन जमात-ए-इस्लामी ने खारिज होने के बाद भी जो 68 सीटें जीती हैं, उनमें से 51 सीटें वो हैं, जो भारत की सीमाओं से लगते जिलों में जीती गई हैं. सतखिरा में जमात ने चार सीटें जीती हैं, जो बंगाल की उत्तरी और दक्षिण 24 परगना से लगता हुआ जिला है. शेरपुर का बॉर्डर मेघालय से लगता हुआ है. और भी सीटें हैं, जो सीधे तौर पर भारत को प्रभावित करती हैं. जैसे कुष्टिया में भी 4 में से 3 सीटें जमात के खाते में गईं. रंगपुर क्षेत्र में भी जमात ने मजबूत पकड़ दिखाई. अन्य सीमावर्ती इलाकों जैसे नाओगांव-2, जॉयपुरहाट-1, शेरपुर-1 और गाइबंदा-1 में भी जमात या उसके सहयोगी आगे रहे. जमात की ये जीत मस्जिद और मदरसा नेटवर्क पर आधारित हैं, जहां लंबे समय से स्थानीय प्रभाव है. ये मतदाता शहरी विरोधी नहीं हैं, बल्कि गहरे ग्रामीण इलाकों से हैं, जहां हिंसा की पुरानी यादें और धार्मिक नेटवर्क मजबूत हैं.

    लिहाजा सवाल बना हुआ है कि जो जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश में कुछ खास नहीं कर पाया, क्या वो भारत से लगते जिलों में अपना कुछ प्रभाव छोड़ पाएगा. ये सवाल इसलिए भी अहम है, क्योंकि बांग्लादेश के अखबार और वहां का मीडिया ये मानता है कि जमात के वोटर वो मुस्लिम हैं, जो भारत और खास तौर से पश्चिम बंगाल से निकलकर बांग्लादेश गए हैं. भारतीय खुफिया एजेंसियों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि जमात की बढ़ती राजनीतिक वैधता कट्टरपंथियों को आत्मविश्वास, कवर और स्थानीय सुरक्षा देगी. पहले घुसपैठ में संख्या पर फोकस था, लेकिन अब चुनिंदा घुसपैठ होती है, जिनमें प्रशिक्षित विचारधारा वाले लोग, फंड कूरियर और डिजिटल हैंडलर्स शामिल हैं. उनकी संख्या बेशक कम है, लेकिन उनका प्रभाव ज्यादा हो सकता है. रिपोर्ट में साफ कहा गया कि खतरा तत्काल हमलों से नहीं, बल्कि लंबे समय में रेडिकल इकोसिस्टम के बनने से है.

    इसलिए बांग्लादेश में हार के बाद भी भारत के बॉर्डर इलाकों में जमात के बढ़े प्रभाव को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है. भले ही जमात पश्चिम बंगाल या फिर असम के चुनाव में बेअसर रहे, लेकिन खुफिया एजेंसियों के लिए जमात की बढ़ी ताकत चिंता का विषय तो है. और ये चिंता तब दूर होगी, जब प्रधानमंत्री तारिक रहमान अपनी मां खालिदा जिया के उलट भारत के साथ अपने संबंधों को और भी प्रगाढ़ करने की कोशिश करेंगे, जिसकी पहल हो चुकी है.

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