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    Iran Protest: कौन हैं ईरान के निर्वासित क्राउन प्रिंस रजा पहलवी? जिनकी अपील बनी चिंगारी, सड़कों पर उतर गए लोग

    6 days ago

    ईरान में पिछले एक महीने से जारी आर्थिक संकट के बाद बड़ी संख्या में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. देश के कई बड़े शहरों में गुरुवार (8 जनवरी 2026) की रात अचानक भड़के प्रदर्शनों के पीछे निर्वासित क्राउन प्रिंस रजा पहलवी की अपील को अहम कारण माना जा रहा है. हालात इतने बिगड़ गए कि ईरानी सरकार को पूरे देश में इंटरनेट सेवाएं बंद करनी पड़ीं.

    इन प्रदर्शनों को नई दिशा तब मिली जब रजा पहलवी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक वीडियो संदेश जारी कर लोगों से रात 8 बजे सड़कों पर उतरने की अपील की. अपील के कुछ ही घंटों बाद हजारों की संख्या में लोग बाहर आ गए, जिससे आंदोलन की तीव्रता अचानक बढ़ गई. रजा पहलवी ने कहा,'ईरानी जनता ने आज़ादी की मांग की है और जवाब में शासन ने इंटरनेट और संचार के सभी रास्ते बंद कर दिए हैं.'

    कौन हैं रजा पहलवी?

    रजा पहलवी ईरान के अंतिम शाह मोहम्मद रजा पहलवी के बेटे हैं. उनका जन्म 31 अक्टूबर 1960 को हुआ था. उन्हें 1967 में आधिकारिक रूप से क्राउन प्रिंस घोषित किया गया था. हालांकि, 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद शाही परिवार को ईरान छोड़ना पड़ा. फिलहाल वह अमेरिका में रह रहे हैं. उन्होंने अमेरिका से राजनीतिक विज्ञान में शिक्षा प्राप्त की है और खुद को धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और मानवाधिकार समर्थक ईरान का पक्षधर बताते हैं.

    क्यों भड़का जनाक्रोश?

    तेहरान, मशहद और अन्य प्रमुख शहरों में गुरुवार रात भारी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए. प्रदर्शनकारियों ने ईरान के धार्मिक नेतृत्व के खिलाफ जमकर नारेबाजी की. 'तानाशाह मुर्दाबाद', 'इस्लामिक रिपब्लिक का अंत' और 'पहलवी लौटेंगे' जैसे नारे देर रात तक गूंजते रहे. विशेषज्ञों के अनुसार, आंदोलन की जड़ में गहरा आर्थिक संकट है. मौजूदा वक्त में ईरानी मुद्रा रियाल ऐतिहासिक निचले स्तर पर गिर गया है. महंगाई और बेरोज़गारी चरम पर है. अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से अर्थव्यवस्था जर्जर स्थिति में है. इन हालातों में युवाओं और मध्यम वर्ग का गुस्सा अब खुलकर सामने आ रहा है.

    सरकार की जवाबी कार्रवाई

    प्रदर्शन तेज होते ही सरकार ने इंटरनेट और लैंडलाइन सेवाएं बंद कर दीं. सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी. कई इलाकों में बल प्रयोग की खबरें सामने आ रही है. इस दौरान 42 लोगों की मौत भी हो चुकी है. मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, दमनात्मक कार्रवाई में हताहतों की संख्या बढ़ सकती है.

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