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    India-EU Trade Deal: भारत-यूरोप की ट्रेड डील से बांग्लादेश की बर्बादी तय है, जानें कैसे

    3 days ago

    भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच जो फ्री ट्रेड एग्रीमेंट हुआ है और जिसे दोनों तरफ से मदर ऑफ ऑल डील्स कहा जा रहा है, उस डील ने न सिर्फ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के माथे पर पसीना ला दिया है बल्कि भारत का एक और पड़ोसी देश बांग्लादेश भी इस डील से हैरान है. और इसकी वजह ये है कि इस डील के लागू होने के साथ ही भारत का कपड़ा कारोबार उस ऊंचाई तक पहुंच जाएगा, जहां पहुंचने का सपना कभी बांग्लादेश देखा करता था. लेकिन इस डील ने न सिर्फ बांग्लादेश का वो सपना तोड़ा है बल्कि इस डील ने बांग्लादेश की बर्बादी की वो कहानी भी लिख दी है, जिसे मोहम्मद यूसूफ कभी सोच भी नहीं पाए थे.

    यूरोपीयन यूनियन में कपड़ों का बाजार करीब 263 बिलियन डॉलर का है. इसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी चीन की है, जिसकी इस बाजार में 28 से 30 फीसदी की हिस्सेदारी है. दूसरे नंबर पर बांग्लादेश है, जो इस पूरे बाजार के 21 से 22 फीसदी पर अपना कब्जा जमाए हुए है. इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि बांग्लादेश को यूरोपियन यूनियन में ड्यूटी फ्री एक्सेस है, जिससे उसका कारोबार बड़ा है. तीसरे नंबर पर तुर्किए है, जिसका इस पूरे बाजार के करीब 10 से 12 फीसदी हिस्से पर कब्जा है. भौगोलिक तौर पर तुर्किए यूरोप के करीब है, तो तुर्किए के बड़े ब्रान्ड के कपड़े यूरोपियन यूनियन में खप जाते हैं. वियतनाम भी ठीक-ठाक कपड़े यूरोपियन यूनियन को बेच लेता है. और वो भी बिल्कुल ड्यूटी फ्री. तो यूरोपियन यूनियन के लोग उन कपड़ों को खुशी-खुशी सस्ते में खरीद लेते हैं.

    जैसे ही बात भारत की आती है, तो अभी तक भारत महज 5 से 6 फीसदी बाजार पर ही नियंत्रण रख पाया है. अगर आंकड़ों में बात करें तो यूरोप का जो कपड़ा बाजार 263 बिलियन डॉलर का है, उसमें भारत करीब 8 बिलियन डॉलर के ही कपड़े बेच पाता है. इसकी सबसे बड़ी वजह ये रही है कि भारत से जो कपड़ा यूरोप को भेजा जाता है, उसपर 9 फीसदी से लेकर 12 फीसदी तक का टैक्स लगता था. अब भी लग रहा है. लेकिन जब ये फ्री ट्रेड एग्रीमेंट लागू हो जाएगा तो भारत के कपड़े पर लगने वाला टैक्स जीरो हो जाएगा. और तब भारत भी बांग्लादेश और वियतनाम जैसे एक्सपोर्ट्स की लिस्ट में शामिल हो जाएगा, जिसके कपड़ों पर टैक्स नहीं लगता है.

    भारत सरकार की ओर से इस ट्रेड डील को लेकर जो फायदे गिनाए गए हैं, उसमें टेक्सटाइल्स इंडस्ट्री को लेकर साफ तौर पर बताया गया है कि पूरी दुनिया में भारत करीब 36.7 बिलियन डॉलर यानी कि करीब 3.19 लाख करोड़ रुपये के कपड़े बेचता है. यूरोपियन यूनियन को अभी तक भारत 7.2 बिलियन डॉलर यानी कि करीब 62 हजार करोड़ के ही कपड़े बेच पाता था, लेकिन ट्रेड डील के बाद न सिर्फ भारत का निर्यात बढ़ेगा बल्कि इस डिमांड को पूरा करने के लिए कपड़ा कारोबार में और भी लोगों की जरूरत पड़ेगी और इससे नई-नई नौकरियां भी मिलेंगी और अमेरिकी बाजार पर निर्भरता भी कम होगी, क्योंकि अभी तक अमेरिका ही था, जो भारत से सबसे ज्यादा कपड़े खरीदता था. लेकिन अब आने वाले दिनों में यूरोपियन यूनियन उस अमेरिका की जगह ले सकता है, जिसने अपने टैरिफ की वजह से सबको परेशान कर रखा है.

    और रही बात बांग्लादेश की, तो उसकी तो बर्बादी तय है. क्योंकि अभी तक तो बांग्लादेश चीन के बाद दूसरा ऐसा देश है, जो कपड़े का बड़े पैमाने पर उत्पादन करता है और दुनिया को बेचता है. यूरोपियन यूनियन में ड्यूटी फ्री एक्सेस मिला है, तो वो उसका सबसे बड़ा बाजार है. हालांकि बांग्लादेश को कच्चे माल के लिए चीन पर निर्भर रहना पड़ता है, भारत भी उसे कच्चा माल देता है और वो एक ही तरह के कपड़े जैसे टीशर्ट, लोअर, जींस और बेसिक गार्मेंट बनाता है. लेकिन अब जब भारत को भी यूरोयिन यूनियन में ड्यूटी फ्री एक्सेस मिल रहा है तो फिर बांग्लादेश के इस बाजार पर असर पड़ना तय है, क्योंकि एक तो भारत के पास कपड़ा बनाने की विविधता है, वो साड़ी से लेकर डिजाइनर कपड़े तक बनाता है, दूसरा भारत के पास कच्चे माल और खास तौर से कपास की कोई कमी नहीं है और सबसे बड़ी बात कि राजनीतिक स्थिरता है. ऐसे में कभी गृहयुद्ध जैसे हालात तो कभी राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहे बांग्लादेश के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती अपने कपड़ा कारोबार को बचाने की है, क्योंकि ट्रेड डील के बाद भारत वो जगह लेने के लिए पूरी तरह से तैयार है.

    बाकी तो इस ट्रेड डील के बाद भारत का लक्ष्य है कि वो अगले पांच साल में यूरोपियन यूनियन को दोगुना कपड़ा बेचे. यानी कि अभी जो कारोबार 7 बिलियन डॉलर का है, वो 15 बिलियन डॉलर का हो जाए. जब ये होगा तो भारत में नौकरियां भी आएंगी और सरकार का मानना है कि इसकी वजह से अगले कुछ साल में करीब 70 लाख लोगों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से रोजगार मिलेगा. अभी तक कपड़ा कारोबार में करीब पांच से साढ़े पांच करोड़ लोग जुड़े हुए हैं और सरकार का लक्ष्य है कि 2030 तक इनकी संख्या 10 करोड़ तक पहुंच जाए. उम्मीद है कि ये ट्रे़ड डील इस मुकाम को हासिल करने में भरपूर मदद करेगी.

     

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