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    बच्चा ऑनलाइन गेम खेलता है, उसके दिमाग में सुसाइड के ख्याल तो नहीं आ रहे? ये संकेत दिखें तो हो जाएं अलर्ट

    5 days ago

    उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से आई एक दर्दनाक खबर ने पूरे देश को झकझोर  कर रख दिया है. यहां तीन नाबालिग सगी बहनों ने नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली. शुरुआती जांच में सामने आया कि तीनों बहनें एक टास्क बेस्ड ऑनलाइन कोरियन लव गेम की आदी थी. वहीं यह घटना सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं बल्कि डिजिटल दौर में बच्चों की मानसिक सुरक्षा को लेकर एक बड़ी चेतावनी मानी जा रही है.

    दरअसल साहिबाबाद की भारत सिटी सोसाइटी में रहने वाली तीन बहनें, जिनकी उम्र करीब 12, 14 और 16 साल थी. लंबे समय से मोबाइल गेमिंग में डूबी हुई थी. बताया गया कि वे न स्कूल जाती थी और न ही बाहर किसी से मिलती थी. तीनों ने अपने लिए कोरियन नाम तक रख लिए थे और कोरियन कल्चर को फॉलो करने लगी थी. परिवार के अनुसार पिता ने जब उनकी गेमिंग की आदत पर आपत्ति जताई और मोबाइल फोन छीन लिया, तो तीनों गहरे मानसिक दबाव में चली गई. जिसके बाद उन्होंने फ्लैट की बालकनी से छलांग लगाकर जान दे दी. मौके से एक सुसाइड नोट भी मिला, जिसमें लिखा था मम्मी-पापा सॉरी... हम गेम नहीं छोड़ पा रही है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि बच्चा ऑनलाइन गेम खेलता है तो उसके दिमाग में सुसाइड के ख्याल तो नहीं आ रहे हैं और कौन से संकेत दिखें तो आपको अलर्ट हो जाना चाहिए. 

    क्या है कोरियन लव गेम?

    एक्सपर्ट्स के अनुसार कोरियन लव गेम एक ऐसा ऑनलाइन गेम है, जिसमें सोशल मीडिया के जरिए एक अनजान व्यक्ति यूजर से संपर्क करता है. वह खुद को काेरियन बताकर  दोस्ती और प्यार की बातें करता है. वहीं भरोसा जीतने के बाद वह छोटे-छोटे टास्क देना शुरू करता है. वहीं शुरुआत में टास्क आसान होते हैं, लेकिन धीरे-धीरे मुश्किल और मानसिक दबाव बढ़ाने वाले हो जाते हैं. अगर यूजर टास्क पूरा करने से मना करें तो उसे डराया और धमकाया जाता है. इस तरह के गेम में करीब 50 टास्क होते हैं, जो कई दिनों तक चलते हैं. 

    ऑनलाइन गेम बच्चों के दिमाग पर कैसे डालते हैं असर?

    एक्सपर्ट्स का कहना है कि बच्चों और किशोरों का दिमाग पूरी तरह विकसित नहीं होता है. ऐसे में वे गेम के कैरेक्टर और चैलेंज को ही असली दुनिया मानने लगते हैं. टास्क पूरे करने का दबाव, डर और हार का भय उनके निर्णय लेने की क्षमता को कमजोर कर देता है. इसके अलावा अमेरिकी साइकोलॉजिस्ट जीन एम. ट्वेंग की किताब iGen के अनुसार 2011 के बाद से ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया एडिक्शन के कारण युवाओं में डिप्रेशन और आत्महत्या के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है.

    कौन से संकेत दिखें तो हो जाएं अलर्ट 

    अगर आपका बच्चा हर वक्त मोबाइल या गेम के बारे में ही सोचता रहता है, गेम रोकने पर गुस्सा या चिड़चिड़ापन दिखाता है, परिवार और दोस्तों से दूरी बनाने लगे,  नींद और दिनचर्या बिगड़ जाए, पढ़ाई में रुचि खत्म हो जाए, बार-बार उदासी, डर  या खालीपन महसूस करें तो ये ऑनलाइन गेमिंग एडिक्शन के संकेत हो सकते हैं. एक्सपर्ट्स के अनुसार अगर ऐसे 4 से 5 संकेत लगातार दिखें तो पेरेंट्स को तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए. 

    पेरेंट्स क्या करें?

    एक्सपर्ट्स बताते हैं कि बच्चों को मोबाइल देना पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन निगरानी बहुत जरूरी है. पेरेंट्स को बच्चों से खुलकर बात करनी चाहिए. उनके स्क्रीन टाइम पर नजर रखनी चाहिए  और  स्मार्टफोन में पेरेंटल कंट्रोल का इस्तेमाल करना चाहिए. पेरेंटल कंट्रोल की मदद से बच्चों के गेम्स, ऐप्स और ऑनलाइन कंटेंट को सीमित किया जा सकता है. इससे वे खतरनाक गेम्स और चैलेंज से दूर रह सकते हैं. 

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    Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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